Smart Trader vs Loser Trader

मार्केट सबके लिए एक जैसा है — लेकिन हर कोई प्रॉफ़िट नहीं कमा पाता। स्मार्ट ट्रेडर और लूज़र ट्रेडर के बीच का फ़र्क चार्ट में नहीं, माइंड में होता है।

Trader mindset कैसे होना चाहिए?
रिस्क पहले कैलकुलेट करना है, रिवॉर्ड बाद में लेना है।

मार्केट में सबसे बड़ा हथियार कोई इंडिकेटर नहीं — पेशेंस और माइंडसेट है।

मार्केट में स्मार्ट बनना है तो स्ट्रेटेजी से ज्यादा अपने इमोशन पर काम करना चाहिए।

सही टाइम का इंतजार, मार्केट 2/3 स्टॉप लॉस लगे तो उस दिन के लिए ट्रेडिंग बंद रखना चाहिए। बदला ट्रेडिंग से अपना कैपिटल पे असर पढ़ता है और कॉन्फिडेंस लूज होता है।

 ट्रेडिंग में हारने वाले और जीतने वाले में फर्क इंडिकेटर्स से नहीं,
सोच, हिसाब-किताब और माइंडसेट से बनता है।

लूज़र ट्रेडर क्या करता है?
रिवार्ड पहले सोचता है, रिस्क बाद में समझता है।

ट्रेड जज्बातों में आकर लेता है—इम्पल्स ट्रेडिंग।

जर्नल नहीं रखता, इसलिए गलती दोहराता रहता है।

न्यूज़ के पीछे भागता है, डेटा समझने की कोशिश नहीं करता।

10,000 रुपये लगा कर 50,000 की उम्मीद करता है—
और फिर बार-बार अपना पैसा गंवाता है।

एंट्री – इमोशन-बेस्ड, बिना लॉजिक।

एग्जिट – रैंडम, कभी भी, कहीं भी।

रिस्क – अनडिफाइंड, SL नहीं लगाता।

साइकोलॉजी – डरपोक, हर गिरावट में पैनिक।

नुकसान के बाद मार्केट को “जुआ” बोलता है।

 स्मार्ट ट्रेडर क्या करता है?

रिस्क पहले कैलकुलेट करता है, रिवॉर्ड बाद में लेता है।

हर छोटे-बड़े ट्रेड का जर्नल मेंटेन करता है।

स्ट्रेटेजी टेस्ट करता है—बैकटेस्ट, फॉरवर्ड टेस्ट, फिर लाइव।

डेटा-बेस्ड ट्रेडिंग, न्यूज़ से इंफ्लुएंस नहीं होता।

सिर्फ़ 5–10% मंथली रिटर्न चाहता है, क्योंकि वही टिकाऊ है।

एंट्री – रूल-बेस्ड, साफ़ नियमों पर।

एग्जिट – प्लान्ड, पहले से तय।

रिस्क – फिक्स्ड, हर ट्रेड में SL और लॉट साइज़ सेट।

साइकोलॉजी – शांत, कंट्रोल्ड और डिसिप्लिन्ड।

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