पहले और आज में कितना फर्क है !
आज का समय बनाम पहले का समय:
क्या खो दिया हमने तरक्की की इस दौड़ में?
भूमिका:
समय बदलता है, और उसके साथ जीवन, सोच, आदतें, ज़रूरतें — सबकुछ बदल जाता है। प्राचीन समय से लेकर मध्यकाल और फिर आधुनिक समय तक मानव जीवन का विकास होता गया। विज्ञान, तकनीक और आधुनिक साधनों ने हमारी ज़िंदगी को आरामदायक तो बनाया, लेकिन क्या इसके बदले हमने अपनी कुछ अनमोल चीज़ें खो दी हैं? इस ब्लॉग में हम यह जानेंगे कि प्रकृति के अनुसार जीवन, खाना-पीना, रिश्तों की मिठास, स्वास्थ्य और मानसिक शांति — इन सबमें पहले और अब के समय में क्या बड़ा अंतर आया है।
प्रकृति के साथ तालमेल वाली ज़िंदगी -
प्राचीन और मध्यम समय में लोग प्रकृति को अपनी माँ मानते थे। उनकी जीवनशैली का हर हिस्सा प्रकृति से जुड़ा हुआ था: खेतों में काम, ताज़ी हवा, शुद्ध पानी, दिन-रात का सही
अनुशासन, प्रकृति के नियमों का पालन, सुबह सूरज के साथ उठना, रात को जल्द सो जाना…शरीर और मन दोनों के लिए उत्तम व्यवस्था थी।
आज?
रात भर मोबाइल, गेमिंग, ओटीटी, सुबह शरीर भारी, दिमाग थका हुआ —प्रकृति की ताल से पूरी तरह दूर।
खाना-पीना: प्राकृतिक से रासायनिक की ओर -
पहले:
खेतों से ताज़ा अनाज, मौसमी सब्जियाँ, शहद, गुड़, गाय का दूध, देसी घी, घर का बना खाना। किसी भी चीज़ में मिलावट या रसायन नाम की चीज़ नहीं थी। इसलिए: शरीर मजबूत, बीमारियाँ कम, आयु लंबी। अब: पैकेट वाला खाना, ठंडे पेय, जंक फूड, रासायनिक दवाइयाँ और प्रिज़र्वेटिव, फास्ट लाइफ़स्टाइल में हड़बड़ी का खाना। परिणाम: शुगर, बीपी, मोटापा, दिल की बीमारी, कमजोर, प्रतिरोधक क्षमता, बचपन में ही चश्मा।
प्रकृति का सिद्धांत साफ है —
“जो आपके आसपास उगता है, वही आपके शरीर के लिए सबसे उपयुक्त।”
रिश्तों में प्यार और अपनापन
पुराने समय के लोग कम साधनों में भी बहुत खुश रहते थे।
हर घर में संयुक्त परिवार, बुजुर्गों का सम्मान और बच्चों का संस्कार — यह आम बात थी। पड़ोसी ही रिश्तेदार, त्योहार पूरे गाँव के साथ,दुःख-सुख में एक-दूसरे का साथ।
अब: सोशल मीडिया पर हज़ार दोस्त, पर वास्तविक ज़िंदगी में अकेलापन, परिवार छोटे, संवाद कम, दूरियाँ ज़्यादा। रिश्ते अब “टाइप करके भेजने” जैसे हो गए हैं।
मानसिक शांति और सादगी वाली ज़िंदगी
पहले: मन का संतुलन मजबूत, पूजा, भजन, ध्यान, शारीरिक श्रम, प्रकृति की गोद में जीवन।अब: 24x7 स्क्रीन, तनाव, अवसाद, चिंता, अधिकता की लालसा, समय की कमी, तरक्की हुई, पर सुकून खो गया।
शिक्षा में संस्कार और नैतिकता
पहले शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं थी —
गुरु-शिष्य परंपरा, नैतिकता और चरित्र निर्माण, व्यवहारिक ज्ञान, शारीरिक अभ्यास।अब शिक्षा —अधिकतर सिर्फ नोकरी पाने का साधन। नैतिकता की जगह “कंपटीशन” ने ले ली है।
मेहनत से मिली सेहत
पहले काम और व्यायाम, एक ही चीज़ - खेती, पशुपालन, चलना, साइकिल…। इसका परिणाम: शरीर मजबूत, हड्डियाँ सशक्त, बीमारियों से रक्षा।
अब: दफ्तर, कुर्सी, तनाव, चलना भी कम।लेकिन इसके बदले स्वास्थ्य कमज़ोर पड़ गया।
बाज़ारवाद और भौतिकता का प्रभाव
पहले: “ज़रूरत” थी — तो पूरा हुआ। अब: “इच्छाओं” का कोई अंत नहीं। नयी-नयी चीज़ों की चाह ने इंसान को लालच और चिंता से भर दिया है। खुशी वस्तुओं में नहीं, फिर भी हम वहीं खोजते हैं।
समय का महत्व
पहले: लोगों के पास समय था — एक-दूसरे के लिए अच्छी बातें, अनुभव, संस्कार — पीढ़ियों तक पहुँचते। अब: सब व्यस्त हैं — न खुद के लिए समय,न परिवार के लिए
“प्रगति ने कदमों को तेज़ किया,
पर दिलों की दूरी भी बढ़ा दी।”
गाँव की मिट्टी वाली खुशबू
पहले गाँव ही भारत की पहचान था: खुला वातावरण, पैदल चलना, पशुओं से अपनापन। अब शहरों की कंक्रीट और धुआँ
पेड़-पौधे कम, बच्चों को मिट्टी से डर
त्योहार और परंपराएँ
पहले त्योहार मतलब: मिलजुलकर खुशी, घर पर पकवान, गीत-नृत्य, स्थानीय संस्कृति। अब त्योहार: ऑनलाइन वीडियो कॉल, बाजार के पकवान, फोटो शूट, भावनाएँ कम — दिखावा ज़्यादा।
स्वास्थ्य और आयु में अंतर
विषय पहले का समय आज का समय: औसत आयु लंबी और स्वस्थ बढ़ी, पर बीमारियों के साथ, रोग सीमित बहुत अधिक
मानसिक स्वास्थ्य बेहतर चिंता व अवसाद, दवाइयाँ कम अधिक निर्भरता, कहने को चिकित्सा विकसित हुई, पर हम पहले से अधिक बीमार हो गए।
सच क्या है? निष्कर्ष: तकनीक के विकास ने जीवन को
सुविधाजनक बनाया है। इस पर कोई संदेह नहीं। लेकिन: प्रकृति से दूरी, परिवार से दूरी, स्वास्थ्य से दूरी,मानसिक शांति का अभाव, ये बातें बताती हैं कि विकास के साथ बहुत कुछ छूट भी गया है।
हमें किस दिशा में चलना चाहिए?
पुराने ज़माने की अच्छाई को मॉडर्न लाइफ के साथ बैलेंस करना ही समझदारी है: Seasonal & local food अपनाएँ,
परिवार और रिश्तों के लिए समय निकालें, प्रकृति के संपर्क में रहें, मोबाइल समय कम करें, मानसिक शांति को प्राथमिकता दें, सरल जीवन जीने की कोशिश करें।
“तरक्की तभी सार्थक है - जब वह हमें मन, शरीर और आत्मा — तीनों में स्वस्थ बनाए।”
अंतिम शब्द - पुराने समय की सादगी, प्रकृति का साथ और रिश्तों का अपनापन — यही वो खजाना है जो किसी भी आधुनिक साधन से कीमती है। हमें पुरानी अच्छाइयों को संजोते हुए नए समय को अपनाना चाहिए।
लेखक परिचय:
दीनेश कुमार महांता
भारत की संस्कृति, प्रकृति और जीवनशैली पर विचार लेखन में रुचि। स्वस्थ और संतुलित जीवन के समर्थक।
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